शुक्रवार, 28 मार्च 2025

ओ री चिड़िया रानी



चीं चीं !


गौरैया दिवस के दिन 


कहाँ थी तुम 


कितना ढूँढी थी मैं पार्क में तुम्हें 


पर


तुम बालू पर फुदकती नजर न आयी 


सुन रही थी


 तुम्हारी चहचहाट पेड़ों में 


नीचे न उतरी तुम 


तुम भी अपना दिवस मना रही थी क्या 


खींचना चाहती थी तुम्हारी फोटो ……


आज तीन दिन बाद 


फुदकती नजर आयी हो  तुम बालू पर 


नाराज हूँ मैं तुमसे 


ओ री ! चीं चीं 



शनिवार, 22 मार्च 2025

घर कहाँ है

  

 

 


 

 

प्रतिदिन घर से दूर जाती थी

 

और लौटती घर

 

पर घर तो मेरा था ही नही

 

वह तो मेरे बच्चों का था

 

सुरक्षित रहते थे वे घर में पढ़ते लिखते थे

 

स्कूल भी स्कूल से भेजे बस से चले जाते थे और लौट आते थे

 

बच्चे बड़े हुये

 

चले गये अपना घर बनाने

 

और

 

मैं दूसरों के घरों की महसूस कर रही हूँ गर्माहट

 

अपने घर के अभाव में घर के ज़्यादा याद आती है


गुरुवार, 20 मार्च 2025

कविता का जन्म



छटपटाहट होती है 


बेचैन होता है मन


कोई श्रोता नहीं 


तो बहते हैं भाव कविता के रूप में 


मन खाली हो जाता है 


कविता की नाल कट जाती है ।



बुधवार, 12 मार्च 2025

हमारा घर

11/03/25

 

 

 

 

मिले

 

बैठे

 

बतियाये

 

बिखर गये

 

अपने अपने शहर में

 

कमाने खाने

 

मिलने के स्थान बदल सकते हैं

 

हम नहीं


शनिवार, 8 मार्च 2025

सड़ा पौधा

  


 

 

ब्याहता बेटी मेरी नहीं

 

ब्याहता बेटा मेरा है

 

यही बीज है

 

सड़ते पौधे का

 

गंधाते समाज का